शिक्षक नहीं सरंक्षक कहिये , भाई कहिये , पिता कहिये।

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बोङिाल, उबाऊ और तोता रटंत प्राथमिक शिक्षा से छात्र-छात्रओं की रुचि कम हो रही है। कक्षाएं खाली पड़ी रहती हैं। यह नजारा शहर और गांव की हर प्राइमरी पाठशाला में है। शिक्षकों की उदासीनता बिरादरी के बीच एक अध्यापक ने मनोरंजक तरीके से पढ़ाने की पहल की है और इसका परिणाम इतना सुखद आया कि बच्चे अब मन लगा कर पढ़ रहे हैं। बेसिक शिक्षा के अधिकारियों को भी यह पहल भा जाए तो प्राइमरी पाठशालाओं का माहौल ही बदल सकता है।चौमुहां के प्राथमिक विद्यालय में तैनात सहायक अध्यापक शिवकुमार पचौरी इस बात से बड़े दुखी थे कि कक्षाओं में बच्चे आते ही नहीं थे। बंक मारना उनका शगल बन गया था। अक्सर खाली कक्षा देख कर वह इस माहौल को बदलने के बारे में सोचते। करीब चार साल पहले उन्होंने एक प्रोजेक्टर खरीदा। लैपटाप उनके पास था ही। उन्होंने प्रोजेक्टर के जरिए पढ़ाना शुरू किया। कुछ दिन तक छात्र-छात्रओं को संदेशात्मक स्टोरी दिखाई। इसके बाद यू ट्यूब के माध्यम से प्रोजेक्टर पर वर्णमाला, एबीसीडी, गिनती, फलों के नाम, सब्जियों के नाम, शरीर के अंग, कहानी, कविता आदि पढ़ाने लगे और इसका असर बाल मन पर गहरा पड़ गया। बच्चे न केवल कक्षा में आने लगे, बल्कि दूसरे जो बंक मार रहे थे, उनको भी अपने साथ लाने लगे। प्रोजेक्टर और लैपटॉप के माध्यम से कक्षा का माहौल मनोरंजक हो गया। अब यहां छात्र-छात्र न केवल मन से पढ़ते हैं, बल्कि आसानी से याद कर लेते हैं और पूरे समय कक्षा में बने रहते हैं। इसी साल मई में कोशिश के अंतर्गत आयोजित सेमिनार में प्राचार्य ने उन्हें पुरस्कृत किया। अब यह भी माना जा रहा है कि जिले में आधुनिक शिक्षा सबसे पहले उन्होंने ही देना शुरू किया है।

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