चुनावी चकल्लस और उसमें फंसा आम आदमी ।

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मथुरा : पूरे समय वातानुकूलित माहौल में रहने वाले नेता सड़कों, खेतों और आम आदमी के साथ खुद खड़े दिखाने की भरपूर कबायद कर रहे हैं । चुनावों की आहट पाते ही नेता फिर चाहे वो छोटा हो या बड़ा जनता के द्वार हाथ जोड़े नजर आ रहा है । जनता भी इतनी भोली नही जो नेताओं के इस अभिनय से वाक़िफ़ न हो । वातानुकूलित वातावरण में ढल चुकी उनकी चमड़ी इस धूल भरी गर्म दुपहरी को सहन करने में असहज महसूस कर रही है । लेकिन नेताजी हैं कि मानते ही नहीं । खुद को बड़के भैया जो साबित करना है । उधर दिल्ली में बैठे नेता भी खुद को कमतर नहीं आँक रहे और एक दूसरे को जिस भाषा मे संदर्भित कर रहे हैं उससे उनका कद तो बौना होता ही है जनता की नज़र में उनकी छवि भी धूमिल होती है । लेकिन उन्हें क्या ? उन्हें तो जनता के रोजी, रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, जनसँख्या जैसे मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाना है । जनता भी अब तो मानने लगी है कि कोई नृप होय हमे का हानि ।

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